रूप-जलधि में डुबकी दी है, आस
अरूप रतन की लेकर,
घाट-घाट पर अब न फिरूंगा,
अपनी जर्जर नौका खेकर।
समय हुआ अब और न सहनी
ज्वार थपेडों की झंझाए
अमृत तल से बुला रही हैं मुझको
उसकी अमर लताए।
अमर-अमिट मैं वहीं मरूंगा बुझ
जाएंगी सभी तृषाए।
गान, न सुनते कान जिसे, पर, नित्य
वहां जो बहता बजता ,
वही प्राण-वीणा लेकर मैं, अतल
सभा में अब जा रहता।
सुर बांधूंगा मैं चिर दिन के, शेष
करूंगा रोना धोना,
नीरव है जो, उसके चरणों में धर दूंगा
नीरव वीणा।
रूप जलधि में डुबकी दी है, अब
न अरूप रतन को खोना।
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर
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