मीत आया पास बैठा
और मैं जागी नहीं,
नींद थी कैसी निगोड़ी
हाय, मैं हत-भागिनी।
मीत आया रात जब नीरव बनी,
बीन थी उसके करों में
छिड़ रही थी रागिनी ,
स्वप्न में ही मधुर -गुंजन
भर गई वह रागिनी।
हाय, क्यों मेरी निशांए
व्यर्थ बीती जा रही हैं ?
री, उसे क्यों नयन भर-भर
मैं निहार न पा रही
नींद में सखि सांस जिसकी
आ रही और जा रही !
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर
Contact Details:
ScientistBaba03
prateekbansal2003@gmail.com
www.facebook.com/ScientistBaba03
www.linkedin.com/in/scientist-baba-713b93126
+919457971925
और मैं जागी नहीं,
नींद थी कैसी निगोड़ी
हाय, मैं हत-भागिनी।
मीत आया रात जब नीरव बनी,
बीन थी उसके करों में
छिड़ रही थी रागिनी ,
स्वप्न में ही मधुर -गुंजन
भर गई वह रागिनी।
हाय, क्यों मेरी निशांए
व्यर्थ बीती जा रही हैं ?
री, उसे क्यों नयन भर-भर
मैं निहार न पा रही
नींद में सखि सांस जिसकी
आ रही और जा रही !
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर
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