Wednesday, 15 November 2017

मनसा वाचा कर्मणा : विनम्रता में है जीत

वे दिन गए, जब बड़े-बुजुर्गों या पद वालों का छोटों के मन में एक डर रहता था। अब यह डर कामकाज की जगह पर ही नहीं, घर के भीतर भी नहीं चलता। अब दूसरों पर दबाव दिखाना बहुत दिनों तक नहीं चलता। अब दूसरों पर दबाव दिखाना बहुत दिनों तक नहीं चलता और अगर लगातार दबाव बनाया जाए, तो इस चक्कर में उस व्यक्ति का सम्मान जरूर चला जाता है। वैसे तार्किक रूप से देखा जाए, तो जो दूसरों के आगे झुकता है, लोग भी उसी के आगे झुकते हैं। जो सदैव अकड़ में रहता है, लोग उसके साथ रहना पसंद नहीं करते। ठीक वैसे ही, जैसे झुके हुए पेड़ के नीचे हर कोई बेठना चाहता है, लेकिन खजूर की तरह खड़े पेड़ को लोग बस दूर से निहारते हैं, जो छायादार हैं। अतः दूसरों को डराना, धमकाना या अपनी पोसिशन से उनको दबाना, यह सब जीवन जीने का कोई अच्छा तरीका नहीं है।
वैसे भी जीवन का लक्ष्य किसी को झुकाना या दबाना नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भावना से अपना कर्त्तव्य करना है और ऐसा करते हुए स्वंय झुककर रहना। जब हम ऐसा करेंगे, तो हमसे नीचे काम करने वाले लोग देखेंगे कि यह व्यक्ति इतना योग्य और कार्य-कुशल है, फिर भी इसमें अहंकार नहीं है। यह बड़ों को सम्मान और छोटों को स्नेह देते हुए चल रहा है। तब वे सम्मान भी करेंगे और अनुसरण भी।

स्वाभाविक जीवन जीने का यह तरीका यदि हर कोई अपना ले, तो यह दुनिया में कहीं भी कोई कमजोर और कोई ताकतवर नहीं दिखाई पड़ेगा, अपितु सभी एक समान नज़र आएँगे और हर एक अपना कार्य समरसता में रहकर करेगा। क्या ऐसी दुनिया की उम्मीद आपको नहीं है? अगर हाँ, तो फिर चलिए, आज से हम यही प्रण ले कि हम सदैव झुककर अर्थात विनम्र होकर दूसरों का दिल जीतेंगे और सभी को सम्मान देते हुए आगे बढ़ते रहेंगे। इसी में हमारी वास्तविक जीत है।

ब्रह्मकुमार निकुंज



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