Wednesday, 8 November 2017

जब जीवन में रस सूख चले ! गीतांजलि की कविता : गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर



जब जीवन में रस सूख चले
करूणा रिमझिम बन बरस रही ,
अंदर मधु के चुकते -चुकते
तुम गीत सुधा बन सरस बहो !
जब काम -काज, झंझट -झामट
चीखें, चिल्लाए आस-पास ,
मैं देख न पाऊं आर-पार
हे मौन प्रहर के देव , हृदय में
शांत जलद बन बिछल रहो !
जब मन मेरा, यह बेचारा
कुंचित घेरे में आप घिरा
सूने कोने में बैठे रहे -
तब हे उदार, दो खोल द्वार
राजेश्वर बने पधार रहो !
वासना, उछाले रज अपार
भ्रम , भ्रांति ,भूल की धूम -धार
मन में फैलाए अन्धकार -
अति पावन हे, चिर जाग्रत हे,
गर्जित प्रकाश के बन प्रपात
अंतर -तर में निर्बाध झरो !

गुरुदेव रविंद्र नाथ  टैगोर



Contact Details:
ScientistBaba03
prateekbansal2003@gmail.com
www.facebook.com/ScientistBaba03
www.linkedin.com/in/scientist-baba-713b93126 
+919457971925
 

No comments:

Post a Comment

Thanks for your valuable feedback...

ScientistBaba03