मुझे लगता है , हम जो अखबारों , खबरिया चैनलों पर देखते है उसका प्रभाव हमारे मन मस्तिष्क पर पड़ता है , हमारी सोच उससे प्रभावित होती है ।
एक समय था जब मुझे लगता था कॉन्वेंट स्कूल ही सबसे स्कूल होते हैं। ईसाई धर्मावलंबी इसके माध्यम से समाज की सेवा करते हैं। ऐसा आज भी मानता हूं । पर ऐसा मानने का कारण क्या हैं ? सूचना जो अखबारों के माध्यम से हमे मिलती है ।
अगर आपको अखबारों और न्यूज चैनलों के माध्यम से ये कोई जानकारी नहीं मिल रही हैं कि "रामकृष्ण मिशन " जैसी एक संस्था "शिक्षा" के लिए क्या क्या कर रही है और कब से कर रही है , तो क्या आपकी सही अवधारणा बन सकेगी रामकृष्ण मिशन के बारे में । या हिंदू साधुओं के बारे में । एक समय था जब मैं इस मानसिकता से ग्रसित थी कि हिंदु साधु निकम्मे होते है । समाज पर बोझ होते है ।
पर अभी हाल के कुछ वर्षो में रामकृष्ण मिशन को करीब से देखने का अवसर मिला तो मेरी अवधारणा ही बदल गई । मैंने इन दोनो संस्थाओं को समय का पाबंद, अपने काम के प्रति प्रतिबद्ध पाया ।
मीडिया जिस तरह के साधु सामाज आम जनता के सामने दिखाते है उससे एक गलत छबि लोगो के सामने जाती है हिंदू साधु समाज की । सही आंकलन के लिए सच्चे और अच्छे साधुओ को भी मीडिया में दिखाया जाना चाहिए । 
मेरी कोशिश बस इसी दिशा में है कि मैं जो देख और महसूस कर रही हूं वो सब आपलोगो से सांझा कर सकू।
ScientistBaba03
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