लीला-मय, तुमने खेल किया
मुझसे असीम का मेल किया !
इस जर्जर झांझर गागर को फिर-फिर तुम
रीति करते हो।
फिर-फिर नव-जीवन भरते हो।
इस हरित बांस की बंसी को गिरी नद पर
लिए डोलते हो
फिर चिर-नवीन रागिनी फूँक अपने ही बोल
बोलते हो !
उस कोमल करका अमर पारस आनंद-
सिन्धु उमड़ा अपार
जिसमें विलीन हो डूब गई मेरे अंतर की हर
कगार
फिर अद्भुत वाणी का प्रसार !
वरदान, चिरन्तन और अमर इन क्षुद्र -
क्षद्रतर-हांथों पर
आ पड़ते हैं आ रहे हैं
युग आते हैं युग जाते हैं
फिर-फिर उड़ेलते रहने को तुम और जगह
पा जाते हो !
गुरुदेव रविंद्र नाथ टैगोर
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