Friday, 20 September 2019

शायरी जिगर मुरादाबादी की



उनका जो फ़र्ज़ है वो अहले सियासत जानें,
मेरा पैगाम मुहब्बत है जहाँ तक पहुंचे।

सबको मारा जिगर के शेरों ने
और जिगर को शराब ने मारा।

हुजुमे गम मेरी फितरत नहीं  बदल सकते,
क्यूंकि मेरी आदत है मुस्कुराने की।

खुल के हसना तो सबको आता है ,
लोग तरसते हैं इक बहाने को..........  ।


इश्क़ खुद इश्क़ का इनाम है ,
वाह क्या  आगाज  क्या अंजाम है।
हुस्न है, नगमा है , मय है , जाम है,
अब कहाँ ऐ गर्दिश-ऐ -आयाम है।

उसकी रातों का इंतकाम न पूछ ,
जिसने हंस-हंस के दिन गुजारे हैं।

आदमी के पास सब कुछ है मगर ,
एक तन्हा आदमियत ही नहीं।

हमको मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं ,
हमसे जमाना खुद है, जमाने से हम नहीं।

गुलशन परस्त हूँ मुझे गुल ही नहीं अजीज ,
कांटो से भी निबाह किए जा रहा हूँ मैं।

 क्या इश्क़ ने जाना है क्या हुस्न ने माना है,
हम ख़ाक नशीनों की ठोकर पे जमाना है।

दिल को सुकून रूह को आराम आ गया ,
मौत आ गई कि यार तेरा पैगाम आ गया।

ये इश्क़ नहीं आसां, बस इतना समझ लीजै ,
एक आग का दरिया है और डूबके जाना है।




#ScientistBaba03

 ScientistBaba03 
 Only 3P's: Patience Purity Perseverance i.e. All....
 scientistbaba03.blogspot.in

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