यदि आप वास्तव में किसी मनुष्य का चरित्र जानना चाहते हैं तो उसके महान कार्यों को मत देखिए। कोई भी मूर्ख समय पाकर बुद्धिमान हो सकता है। मनुष्य को छोटे-छोटे काम करते देखिए, वे ही वास्तव में किसी महापुरुष का सच्चा चरित्र आपको बता सकते हैं। समय पड़ने पर छोटे -से -छोटे मनुष्यों में भी बड़प्पन आ सकता है , सचमुच बड़ा तो वही है जिसका चरित्र सदा बड़ा है।
घोर परिश्रम आवश्यक है। हमें निरंतर कर्म करते रहना चाहिए। एक क्षण भी बिना कर्म किए हम नहीं रह सकते।
आदर्श मनुष्य वह है जो शान्ति और निर्जनता में रहता हुआ भी अविराम गति से कर्मढय रहता है तथा जो घोर कर्मढयता का केंद्र होते हुए भी वन की सी शान्ति और निर्जनता पाता है। उसने निरोध का रहस्य सीख लिया है। अपने आपको उसने वश में कर लिया है। विशाल नगरी के कोलाहल पूर्ण मार्ग में जाते हुए भी उसका चित्त ऐसा शांत रहता है जैसे वह किसी दूर पर्वत कंदरा में बैठा हो जहाँ पक्षी तक ना बोलता हो; और सारे समय वह कर्मरत रहता है। यही कर्मयोग का आदेश है और यदि आप वहां तक पहुँच गए तो आपने वास्तव में कर्म का रहस्य जान लिया है।
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