Friday, 20 September 2019

ओजपूर्ण कविता

 झांसी की रानी 



सिंहासन हिल उठे राजवंशो ने भृकुटि तानी थी ,
बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी ,
गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी ,
दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी।
चमक उठी सन सत्त्वान में वह तलवार पुरानी थी,
बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी ,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।

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