Saturday, 21 October 2017

Leo Tolstoy

बीमारी ने उन्हें कुछ और सुखा दिया था, उनमें कुछ समाप्त सा हो गया था। अंदर से वह कुछ हल्के से दिखते थे , कुछ अधिक पारदर्शी और अधिक निवृत्त से। फिर भी उनकी आँखें कोतुहल दर्शाती हैं उनकी नज़र भेदती है। वह कुछ ऐसे सुनते हैं जैसे कुछ भूल गए थे या किसी नए और अनजान अनुभव का इंतज़ार कर रहे थे। यास्नया पोल्याना में वह ऐसे व्यक्ति के रूप में थे , जो सब कुछ जानता है और उसे नया कुछ नहीं सीखना - एक ऐसा व्यक्ति जिसने सभी प्रश्न हल कर दिए थे।




यदि वह एक मछली होते तो निश्चित रूप से वह महासागरों में तैरते, कभी उथले सागरों में न आते और विशेषकर पृथ्वी के सतही पानी पर तो बिल्कुल नहीं। उनके गिर्द यहाँ वहाँ दौड़ रही होती छोटी मछलियाँ जो वह कहते उसका उनका उनके लिए कोई मतलब न होता , उनके लिए जरूरी न होता और उनका मौन न उन्हें डराता या धकेलता। इसके बावजूद उनका मौन बहुत प्रभावी होता है , एक ऐसे तपस्वी जैसा जिसे उसकी दुनिया से दूर कर दिया गया हो। हालांकि वह बहुत बोलते हैं और कुछ विषय विशेष के प्रति निष्ठा स्वरुप उनका मौन फिर भी अधिक प्रभावी दिखता है। कुछ ऐसी बातें जो कोई किसी से नहीं कर सकता। बेशक कुछ ऐसे विचार उनके अंदर घुमड़ते हैं जिनसे वह स्वं डरे रहते हैं।

@ScientistBaba03

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ScientistBaba03